प्रणव कुमार मुखर्जी ( parnav kumar mukharji)


 प्रणव कुमार मुखर्जी


नमस्कार । 

आज मै बड़ा दुखी हूं, हमारे बीच भारत के 13 वे पूर्व रास्ट्रपति (प्रथम नागरिक) प्रणव मुखर्जी नही रहे, इनका जाना राजनीति के एक अध्याय पर पूर्ण विराम लग जाना जैसा है, हमे गर्व है ऐसे वयक्तिव का जिनका वास भारत है, भारत देश सदा आप का आभारी रहे गया, जो पद चिन्ह आप ने छोड़ा है सदा ही आप के राजनीतिक अनुजों को एक अच्छा और स्पष्ट शिख देता रहे गया।


तो आइये हम इनके जीवन के  बरे में कुछ जानते है।


नाम -प्रणव मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 में गांव मिराती, जिला बीरभूम, पश्चिम बंगाल में हुआ था,

ये बचपन से ही एक रानीतिक परिवार में पले बढ़े, ये प्रारंभ से ही धार्मिक बिचर के थे, इनकि मृत्यु 31 अगस्त 2020 नई दिल्ली में हुआ था।


परिवार


प्रणव मुखर्जी के पिता  कामदा किंकर मुखर्जी तथा माता राजलक्ष्मी मुखर्जी थी,

इनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे, उसी वक्त ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खड़ा होने पर उन्हें कई वर्षों तक जेल में रखा गया, बाद में रिहा होने के बाद वह पश्चिम बंगाल बिधान परिषद में 1952-1964 तक सदस्य रहे।

प्रणव मुखर्जी का विवाह जुलाई 1957 में सुभ्रा मुखर्जी से हुआ, विवाह के बाद इन्हें दो पुत्र अभिजीत और इंद्रजीत तथा एक बेटी शर्मिस्ठा है, इनकी एक बड़ी बहन अन्नपूर्णा है।

 


शिक्षा


इनकी प्रारंभिक शिक्षा  सूरी विद्यासागर कॉलेज,सूरी (बीरभूम) में हुआ,

आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें कलकत्ता जाना पड़ा,कलकत्ता विश्वविद्यालय से ही उन्होंने पहले इतिहास से मास्टर की डिग्री ली, उस समय कॉलेज में आएदिन राजनीति का बड़ा बोलबाला था, अपने दोस्तों के साथ उन्होंने राजनीति शास्त्र से भी मास्टर की डिग्री हासिल की, इन्हें पढ़ने का बड़ा शौक था, इसीलिए उन्होंने लॉ "वकालत" की भी पढ़ाई की, लेकिन इनका मन कुछ और करने का था, इन्होंने अपने कैरियर की सुरुआत एक अध्यापक के रूप में सुरु किया, उसके साथ-साथ उन्होंने पत्रकारीता भी प्रारम्भ कर दिया और एक पत्रिका भी जारी किया।


कैरीयर


बचपन से ही इनके अंदर एक राजनेता वास कर रहा, इनकी राजनीति कैरीयर की सुरुआत 1969 में पहली बार राज्यसभा सदस्य बनने से हुआ,

जब मनुष्य का एक कदम बढ़ जाता है,तो उसे दूसरा कदम बढ़ाने का साहस पैदा हो जाता है।

इनके तेज दिमाग और शान्तप्रिय आचरण को देखते हुए, जनवरी 1973 में इंदिरा गांधी द्वारा मात्र 39 साल की उम्र में ही पहली बार मंत्री  बनाया गया था।

इसके बाद इनका सफर रफ्तार पकड़ने लगा, लेकिन जहा आप सफलता के मार्ग पर चलने लगते है वहा कोई न कोई रुकावट जरूर आता है।



पद


वर्ष 1984 में भारत के वित्त मंत्री के पद पर आसीन हुए,कहा जाता है कि उस वक्त के सबसे अच्छे वित्त मंत्री थे।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इन्हें पार्टी में कम इज्ज़त मिलने लगी क्योंकि ये इंदिरा जी के बडे प्रिय नेताओं में से एक थे ।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा,ये देखने के बाद उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया और अपनी एक नई पार्टी जिसका नाम "राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस" रखा,

उनके जाने से कांग्रेस पार्टी में उथल पुथल हो रहा था तब राजीव गांधी ने उनसे बात बिचर की और तब जाकर उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया।


P.B नरसिंह राव ने 1991 में इन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया,

1995 में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया।

एक के बाद एक कई सफलता प्रणव जी को मिलती गई मगर कभी किसी चीज का घमंड नही किया।

2004 में लोकसभा चुनाव जीते और साथ ही साथ उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया।

राष्ट्रीपति बनाने से पहले से पहले उन्होंने भारत के लिए कुल 7 बार बजट प्रस्तुत कर चुके थे।


2012के इन्हें राष्ट्रपति पद का प्रत्यासी घोसित किया गया, जुलाई 2012 में भारत के 13वे रास्ट्रपति के रूप में सपत लिये।

 इनका कार्य काल 2012 से 2017 तक रहा, बाद में इन्होंने स्वास्थ्य का कारण बताके राजनीति से दूर होते गये।


सम्मान


सम्मान की बात कटे तो सब से बड़ा सम्मान "भारत रत्न" 26 जनवरी 2019 को इन्हें दिया गया था।

वर्ष 2007 में इन्हें "पद्म विभूषण" से नवाजा गया।

इन्हें 1997में सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान मिला।



अन्य


प्रणव जी को पुस्तक पढ़ने का बड़ा सौख था, उन्होंने  तीन पुस्तके भी लिखी है 1-द ड्रामैटिक डिकेड: द इंदिरा गांधी इयर्स, 2-द टर्बुलेट इयर्स, 3-द कोएलिशन इयर्स,है।  

इन्हें अपनी डायरी लिखने का बड़ा सौख था वे रोज कुछ न कुछ अपनी डायरी में लिखते थे, बताया जाता है कि उन्होंने अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिखा है "अगर मै इस दुनिया को अलबिदा कहा दु तो, मेरे प्रियजन इस डायरी को किताब का रूप दे सकते है मगर मेरे जीते जी नही"

रास्ट्रपति होने के बावजूद भी उन्हीने अपना धार्मिक संस्कार को नही छोड़ा वे प्रति वर्ष नवरात्र में अपने गांव जाकर दुर्गा माँ की आराधना करते थे।


उन्हें टहलने का बड़ा शौख रहता था वे अपने घर मे ही रोज टहलते थे।

बंगाली होने के बावजूद इनका प्रिय व्यंजान-मिठाई होता था।

सरल स्वभाव वाले व्यक्ति सदा दिल मे एक जगह बना लेते है,प्रणव दा आप भी उन्ही व्यक्तियों में से एक हो।


मैं लेखक इस्वर से प्रार्थना करता हु प्रणव कुमार मुखर्जी के आत्मा को सम्पूर्ण शांति प्रदान करे।।

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