कविता "शुखि रोटी"

           सुखी रोटी


1,,सुखी  रोटी  भीगोकर ,उन्हें  खाते  हमने  देखा  हैं।

   गिरे हुए दाने उठाकर ,अपना भूख मिटाते देखा हैं।।

   जिन्दगी  के इस दौर में,सिर पर छाया नही फिर भी ,

   काटो के बिस्तर पर ,सुकून से सोते हुए उन्हें देखा हैं।

   सुखी रोटी  भिगोकर  ,उन्हें  खाते  हमने  देखा  हैं।।


2,,        तन  पर फटे लिबास, फिर भी लाज छिपाते देखा हैं।

            नम भारी आँखे होने पर भी ,मुस्कुराते हुए  देखा हैं।।

         चंद सिक्को की बात नही है जनाब,स्वार्थपूर्ण संसार में,

            अपने  हिस्से  का  भी , औरो  को  देते  हुए  देखा हैं।

            सुखी  रोटी  भिगोकर , उन्हें  खाते  हमने देखा  हैं।।


3,,स्वाभिमान के लिये ,परिस्तिथियों से लड़ते देखा हैं।

कठिनाई भरी  डगर में , नंगे  पैर  चलते  हुए देखा हैं।।

निःशब्द हो जाता हू कभी - कभी ये मंज़र देख कर ,

लावारिस की तरह, इस जहाँ से रुख़सत होते देखा हैं।

सुखी  रोटी  भिगोकर  ,उन्हें  खाते  हमने  देखा  हैं।।

 


आशुतोष कन्नौजिया (मिर्ज़ापुर)

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